Sunday, August 1, 2010

इंद्रधनू..

कल सुबह ९ बजे घर से निकली मैं जरुरी काम के लिए युनिवर्सिटी जा रही थी।
बहुत धुप थी इसलिए मैंने गुस्सेसे सूर्य की तरफ्फ़ देखा तो दंग रह गयी.... ।
सूर्य का प्रकाश आसमान मैं घिरे बादलों पर फ़ैल चूका था ।
मगर रोज के बादलोंकी अपेक्षा इन बादलों का नूर कुछ अलग था।
काले बदल सूर्य को ढ़कने का विफल प्रयास कर रहे थे की अचानक
मेरी दृष्टी आसमान मैं बदलोंसे घिरे सुर्यकी चारों और फैली किरणों पर पड़ी।
किरने अपनी आभा को फैलाये हुए थे ... एक सप्तरंगी इंद्रधनू सूर्य के प्रकाश और उस को घिरे बादलों को भी घिरे हुए था। बड़ा मनोहर दृश्य था ।
मैं तो चलती गाड़ी का ध्यान न हटा सकती थी... मगर अपनी उत्सुकता को भी दबा नहीं सकती थी। लेकिन क्या करती? चलती गाड़ी की और मेरे पीछे बैठे अपने पिता की भी तो फिकर थी मुझे ।
मौका देखते ही मैंने गाड़ी को बाजु में लगाया... और इस दृश्य का भरपूर आनंद उठाया।
पापा की कमजोर आँखे सूर्य की तेज रौशनी को सहन नहीं कर पा रही थी ।
लेकिन मेरी आँखे उत्सुकता के मारे इतनी भावविभोर हुई थी की सूर्य की तेज रौशनी को भी नजरअंदाज कर गयी और सूर्य को घिरा हुआ इंद्रधनू देखती रह गयी! देखती रह गयी! देखती रह गयी!!!
पापा की इच्छा होते हुए भी वे यह दृश्य ना देख पाए ।
इस कारण झल्ला उठे। यह कोई अच्छी बात नाही थी की पापा के झल्लाने पर, गुस्सा होने पर भी मैं खुश हो जाऊ, मगर मैं तो बावरी - सी हो गई थी। इंद्रधनू का नया ॠप देखकर खुश होते हुए पापा के गुस्से को तक नजरंदाज कर गयी!!!